Tuesday, June 9, 2009

और आज लिखा कुछ मानव की कविताओं जैसा...

और एक सच, शब्द या शक़्स पड़ा रहा…

कबाड़ में पड़ें सारे ऐर्यलों जैसा, जिन्होंने बहोत दुनिया खुदसे गुज़रते देखि है, पर जिनका अपना कोई एहसास नहीं, अभिमत नहीं, अभिप्राय नहीं.

उस अभिमत जैसा, जिसके बनते ही उसकी समापन तिथि निश्चित कर देना उसके बनानेवाले का फ़र्ज़ है.

उस देय तिथि जैसा, जिसके भूल से छूट जाने पर रिलायंस का गूंडा आपके दरवाज़े दस्तक देकर आपको ज़लील करने की कोशिश करता है.

उस ज़लीलियत जैसा, जिस पर एक बार आपकी माँ तक कह दे, “पर बेटा, ग़लती तो तुम्हारी ही थी”… जो अगर आप अटके रहो तो नासूर बन जाए, और आप बहते रहो तो चुटकुला.

उस चुटकुले की तरह जो कटाक्ष है, व्यंगमय है, बहोत ही हास्यास्पद है, और जो आप बीता होने के बावजूद उसे खुल्लेआम सबको सुनाना कानूनन झुर्म है.

उस झुर्म की तरह जो आप न चाहते हुए भी कर देते हो, हांफ जाते हो कोर्ट के चक्करों में, और फिर अपने मनपसंद पुस्तकालय के मेक्डोनाल्डीकरण और अपने बच्चों की तालीम के दिज़्नियावर्तन से समझौता कर लेते हो.

उस समझौते की तरह जो पहले न चाहते हुए ही सही, पर बाद में आदत और आखिर आनंद बन जाता है.

उस आदत की तरह जो विन्डोज़ के नए version को पहले कुछ महीनो तक ठुकराने के बाद उसे अपना लेने पर हो जाती है... मायक्रोसोफ्ट वर्ड की बिना पूछे ही शब्द ठीक कर डालने की बुरी आदत की तरह, जिसकी आलोचना नहीं की जा सकती क्योंकि उस आदत को बदलने का विकल्प आपके पास है, छिपा ही सही.

उस विकल्प भ्रम की तरह जो आपको टीवी पर, शौपिंग मॉल में, या किसी Café में उपलब्ध होता है... और पूछने पर कि फलानी और धिकनी काफ़ी में क्या फ़र्क है, एक नवसिखिया भोला सा बेरा आपको बता देता है "कोई नहीं".

उस फ़र्क की तरह जो काले गोरों में, हुतू तुत्सी में, अरब इज़्राएलि में, अंग्रेज़ी संविधानिक एकाधिपत्य और भारतीय लोकतंत्र में है और नहीं.

उस होने और न होने जैसा जो प्रश्न में क्रांति का है, विचार में निर्माण का, और अनुभव में मृत्यु का.

उस मृत्यु जैसा जिसका भय मानव कल्पना में भगवान् को जन्म देता है.

उस जन्म जैसा जिसके आदि में प्यार भरा संभोग नहीं पर बलात्कार की आशंका है, और अंत में वातावरण में मिल जाना नहीं, प्रलय की चेतावनी है.

बहोत हो गया इसके जैसा उसके जैसा! कविता को इतना seriously कौन बेवकुफ़ लेता है!